Deep Pandya's Blog

Spirituality >> Selected Upanishad Shlokas
Published: December 2025

My favorite (selected) Shlokas from Principle (Mukhya) Upanishads


As mentioned in my brief introduction, Upanishads are my favourite philosophical text which focus on spirituality. They are foundation of Vedanta Darshana.

Following are my selected and favourite Shlokas from “Principal (Mukhya)” Upanishads which are are closely associated with the main Vedic branches (Śākhās) and hence are considered more authoritative and reliable than the many later Upanishads whose authorship is uncertain.

This page is under construction and will be finished by 1. Adding English translations, 2. Covering major Chhandogya & Brihadaranyaka Upanishads

Sanskrit Texts are quoted from Sanskrit Documents site, Hindi translations are quoted from the Upanishads published by Gitapress Gorakhpur, with translations are inclined towards Adi Shankaracharya's Bhashya. A copy available mostly in public domain (though commercial use may be restricted) at the Internet Archive. English translations are quoted from the book published by Advaita Ashrama and authored by Swami Gambhirananda. Copies are available in public domain at the Internet Archive: Part-1, Part-2. For any correction/feedback, please connect.

For quick navigation, jump to: 1. Isha (Ishavaya) Upanishad
2. Kena Upanishad
3. Katha Upanishad
4. Prashna Upanishad
5. Mundaka Upanishad
6. Mandukya Upanishad
7. Aitareya Upanishad
8. Taittiriya Upanishad
9. Shvetasvatara Upanishad

1. Isha (Ishavasya) Upanishad (Part of Shukla Yajurveda Samhita):

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५॥

1.15: आदित्यमण्डलस्थ ब्र​ह्मका मुख ज्योतिर्मय पात्रसे ढका हुआ है। हे पूषन्‌ ! मुझ सत्यधर्मा कों आत्माकी उपलब्धि कराने के लिये तू उसे उघांड़ दे ।
1.15: The face of the Truth (Brahman in the solar orb) is concealed with a golden vessel. Do thou, O Sun, open it so as to be seen by me who am by nature truthful (or am the performer of rightful duties).

2. Kena Upanishad (Associated with Talavkar Shaka of Samaveda):

यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ६॥

1.6: जो मनसे मनन नहीं किया जाता, बल्कि जिससे मन मनन किया हुआ कहा जाता है उसीको तू ब्रह्म जान। जिस (इस देश-काटावच्छिन्न वस्तु) की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ।
1.6: That which man does not comprehend with the mind, that by which, they say, the mind is encompassed, know that to be Brahman and not what people worship as an object.

यइह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ ५॥

2.5: य​दि इस जन्ममें ब्रह्मको जान लिया तब तो ठीक है और यदि उसे इस जन्ममें न जाना तत्र तो बड़ी भारी हानि है । बुद्धिमान्‌ लोग उसे समस्त प्राणियोंमें उपलब्ध करके इस लोकसे जाकर ( मरकर ) अमर हो जाते हैं ।
2.5: If one has realised here, then there is truth; if he has not realised here, then there is great destruction. The wise once, having realised (Brahman) in all beings, and having turned away from this world, become immortal.

3. Katha Upanishad (Associated with Katha Shaka of Krishna Yajurveda):

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥ २॥

1.2.2: श्रेय और प्रेय (परस्पर मिले हुए-से होकर) मनुष्यके पास आते हैं । उन दोनोंको बुद्विमान्‌ पुरुष भली प्रकार विचारकर अलग-अलग करता है । विवेकी पुरुप प्रेय​ के सामने श्रेय को ही वरण करता है; किन्तु मूढ़ योग-क्षेमके निमित्तसे प्रेय को​ वरण करता है ।
1.2.2: The preferable and the pleasurable approach mankind. The man of intelligence, having considered them, separates the two. The intelligent one selects the electable in preference to the delectable; the non-intelligent one selects the delectable for the sake of growth and protection (of the body etc.).

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः श‍ृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७॥

1.2.7: जो बहुतोंको तो सुननेके लिये भी प्राप्त होने योग्य नहीं है, जिसे बहुत-से सुनकर भी नहीं समझते उस आत्मतत्त्वका निरूपण करनेवाला भी आश्चर्यरूप है, उसको प्राप्त करनेत्राला भी कोई निपुण पुरुष ही होता है तथा कुशल आचार्यद्रारा उपदेश किया हुआ ज्ञाता भी आश्चर्यरूप है ।
1.27: Of that (Self), which is not available for the mere hearing to many, (and) which many do riot understand even while hearing, the expounder is wonderful and the receiver is wonderful, wonderful is he who knows, under the instruction of an adept.

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूꣳ स्वाम् ॥ २३॥

1.2.23: यह आत्मा वेदाध्ययनद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है और न धारणाशक्ति अथवा अधिक श्रवणसे हो प्राप्त हो सकता हे । यह (साधक) जिस (आत्मा) का वरण करता है उस (आभा) से ही यह प्राप्त किया जा सकता हे । उसके प्रति यह आत्मा अपने स्वरूपक्रो अभिव्यक्त कर देता है ।
1.2.23: This Self cannot be known through much study, nor through the intellect, nor through much hearing. It can be known through the Self alone that the aspirant prays to ; this Self of that seeker reveals Its true nature

आत्मानँ रथिनं विद्धि शरीरँ रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३॥

1.3.3: तू आत्माको रथी जान, शरीरको रथ समझ, बुद्धिको सारथी जान और मनको लगाम समझ ।
1.3.3: Know the (individual) Self as the master of the chariot, and the body as the chariot. Know the intellect as the charioteer, and the mind as verily the bridle.

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३॥

1.3.13: विवेकी पुरुष वाक-इन्द्रियका मनमें उपसंहार करे, उसका प्रकाश-स्वरूप बुद्रिमे लय करे, बुद्धिको महत्तत्वमे लीन​ करे ओर महत्तत्तको शान्त आत्मामें नियुक्त करे।
1.3.13: The discriminating man should merge the (organ of) speech into the mind; he should merge that (mind) into the intelligent self; he should merge the intelligent self into the Great Soul, he should merge the Great Soul into the peaceful Self.

पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू- स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष- दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १॥

2.1.1: स्वयम्भू (परमात्मा) ने इन्द्रियोको बहिर्मुख​` करके हिंसित कर दिया है । इसीसे जीव बाह्य​ बिषयको देखता है, अन्तरात्माको नहीं । जिसने अमरत्वको इच्छा करते इए अपनी इन्द्रियोंको ने रोक लिया है ऐसा कोई घीर पुरुष ही प्रत्यगात्माको देख पाता है ।
2.1.1: The self-existent Lord destroyed the outgoing senses. Therefore one sees the outer things and not the inner Self. A rare discriminating man, deisring immortality, turns his eyes away and then sees the indwelling Self.

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५॥

2.2.15: वहाँ (उस आत्मलोकमें) सूर्य प्रकाशित नहीं होता, चन्द्रमा और तारे भी नहीं चमकते और न यह विद्युत्‌ ही चमचमाती है; फिर इस अग्निकी तो बात ही क्या है ? उसके प्रकाशमान होते हुए ही सब​ कुछ प्रकाशित होता है और उसके प्रकाशसे ही यह सब​ कुछ भासता है ।
2.2.15: There the sun does not shine, neither do the moon and the stars; nor do these flashes of lightning shine. How can this fire? He shining, all these shine; through his lustre all these are variously illumined.

इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक्षरीरस्य विस्रसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४॥ यथाऽऽदर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाऽप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५॥

2.3.4-5: यदि इस देहमें इसके पतनसे पूर्व ही (ब्रह्मको) जान सका तो बन्धनसे सुक्त होता है यदि नहीं जान पाया तो इन जन्म-मरणशील​ लोकोंमें वह शरीर-भावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है । जिस प्रकार दर्प​णमें उसी प्रकार निर्मल​ बुद्विमें आत्माका (स्पष्ट) दर्श​न होता है तथा जैसा स्वप्न​में वैसा ही पितृ-लोकमें और जैसा जल​में वैसा ही गन्धर्व​लोकमें उसका (अस्पष्ट) भान होता हैं; किन्तु ब्रह्मलोकमें तो छाया और प्रकाशके समान वह (सर्वथा स्पष्ट) अनुभव होता है ।
2.3.4-5: As (one secs) in a mirror, so in one’s intellect; as in a dream, so in the world of the manes; as it is seen in water, so in the world of the Gandharvas. As it is in the case of shade and light, so in the world of Brahma. If one succeeds in realising here before the falling of the body, (one becomes freed); (else) because of that (failure) one becomes fit for embodiment in the worlds of creatures.

इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७॥ व्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च । यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८॥

2.3.7-8: इन्द्रियोंसे मन पर (उत्कृष्ट) है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है, शुद्धिसे महत्तत्व​ बढ़कर है तथा महत्तत्त्वसे अव्यक्त उत्तम है । अत्यक्तसे भी पुरुष श्रेष्ठ है और वह व्यापक तथा अलिङ्ग है; जिसे जानकर मनुष्य मुक्त होता है और अमरत्वको प्राप्त हो जाता है ।
2.3.7-8: The mind is superior to the senses; the intellect is superior to the mind ; Mahat (the Great Soul) is superior to the intellect ; the Unmanifested is superior to Mahat. But superior to the Unmanifested is the supreme Purusa who is pervasive and is, indeed, without worldly attributes, knowing whom a man becomes freed and attains immortality.

शतं चैका च हृदयस्य नाड्य- स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६॥

2.3.16: इस हृदयकी एक सौ एक नाडियाँ है; उनमेंसे एक मूर्धाका भेदन करके बाहरको निकली हुई हे । उसके द्वारा ऊर्ध्व​-ऊपरकी और गमन करनेवाला पुरुष अमरत्वको प्राप्त होता है । शेष विभिन्न गतियुक्त नाडियाँ उत्क्रमण (प्राणोत्सर्ग) की हेतु होती हैं ।
2.3.16: The nerves of the heart are a hundred and one in number. Of them the one passes through the head. Going up through that nerve one gets immortality. The others that have different directions, become the causes of death.

4. Prasna Upanishad (Associated with Atharva Veda):

तान् होवाचैतावदेवाहमेतत् परं ब्रह्म वेद । नातः परमस्तीति ॥ ७॥

6.7: तब उनसे उस (पिप्पलाद मुनि)-ने कहा-इस परब्रह्मको मै इतना ही जानता हूँ। इससे अन्य और कुछ (ज्ञातव्य) नहीं है ।
6.7: To them he said, “I know this supreme Brahman thus far only. Beyond this there is nothing."

5. Mundaka Upanishad (Associated with Atharva Veda):

शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ । कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३॥

1.1.3: शौनक नामक प्रसिद्ध महागृहस्थने अंगिराके पास विधिपूर्वक जाकर पूछा- 'भगवन्‌! किसके जान लिये जानेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है ?'
1.1.3: Saunaka, well known as a groat householder, having approached Angiras duly, asked, “0 adorable sir, (which is that thing) which having been known, all this becomes known?”

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदःशिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५॥

1.1.5: उनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष-यह अपरा है तथा जिससे उस अक्षर परमात्माका ज्ञान होता है वह परा है ।
1.1.5: Of these, the lowers comprises the RgVeda, Yajur-Veda, Sama- Veda, Atharva-Veda, rituals, grammar, etymology, metre, and astrology. Then there is the higher (knowledge) by which is realised that Immutable.

यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति । यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाऽक्षरात्संभवतीह विश्वम् ॥ ७॥

1.1.7: जिस प्रकार मकड़ी जालेको बनाती और निगल जाती है, जैसे पृथिवीमें ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और जैसे सजीव पुरुषसे केश एवं लोम उत्पन्न होते हें उसी प्रकार उस अक्षरसे यह विश्व प्रकट होता है ।
1.1.7: As a spider spreads out and withdraws (its thread), as on the earth grow the herbs (and trees), and as from the living man issues out hair on the head and body, so out of the Immutable does the universe emerge here (in this phenomenal creation).

तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा संततानि । तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १॥

1.2.1: बुद्धिमान्‌ ऋषियोंने जिन कर्मोका मन्त्रॉमें साक्षात्कार किया था वही यह सत्य है, त्रेतायुगमें उन कर्मोका अनेक प्रकार विस्तार हुआ। सत्य (कर्मफल)-की कामनासे युक्त होकर उनका नित्य आचरण करो; लोकमें यही तुम्हारे लिये सुकृत (कर्मफलकी प्राप्ति)-का मार्ग है ।
1.2.1: That thing that is such is true. The karmas that the wise discovered in the mantras are accomplished variously (in the context of the sacrifice) where the three Vedie duties get united. You perform them for ever with desire for the true results. This is your path leading to the fruits of karma acquired by yourselves.

धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं संधयीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ ३॥ प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ ४॥ यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ ५॥

2.2.3-5: हे सोम्य! उपनिषद्वेद्य महान्‌ अस्त्ररूप धनुष लेकर उसपर उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढ़ा; और फिर उसे खींचकर ब्रह्मभावानुगत चित्तसे उस अक्षररूप लक्ष्यका ही वेधन कर । प्रणव धनुष है, (सोपाधिक) आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। उसका सावधानतापूर्वक वेधन करना चाहिये और बाणके समान तन्मय हो जाना चाहिये । जिसमें द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और सम्पूर्ण प्राणोंके सहित मन ओतप्रोत है उस एक आत्माको ही जानो, और सब बातोंको छोड़ दो यही अमृत (मोक्षप्राप्ति)-का सेतु (साधन) है ।
2.2.3-5: Taking hold of the bow, that is the great weapon familiar in the Upanishads, one should fix on it an arrow, sharpened with meditation. Drawing the string with a mind absorbed in its thought, hit, O good-looking one, that very target that is the Immutable. Om is the bow; the soul is the arrow; and Brahman is called its target . It is to be hit by an unerring man. One should become one with It just like an arrow. Know that Self alone that is one without a second, on which are strung heaven, the earth, and the inter-space, the mind and the vital forces together with all the other organs;and give up all other talks. This is the bridge loading to immortality

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १०॥

2.2.10: वहाँ (उस आत्मस्वरूप ब्रह्ममें) न सूर्य प्रकाशित होता है और न चन्द्रमा या तारे। वहाँ यह बिजली भी नहीं चमकती फिर यह अग्नि किस गिनतीमें है? उसके प्रकाशित होनेसे ही सब प्रकाशित होता है और यह सब कुछ उसीके प्रकाशसे प्रकाशमान है ।
2.2.10: There the sun does not shine, nor the moon or the stars; nor do these flashes of lightning shine there. How can this fire do so? Everything shines according as He does so; by His light all this shines diversely.

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १॥

3.1.1: साथ-साथ रहनेवाले तथा समान आख्यानवाले दो पक्षी एक ही वृक्षका आश्रय करके रहते हैं। उनमें एक तो स्वादिष्ट (मधुर) पिप्पल (कर्मफल)-का भोग करता है और दूसरा भोग न करके केवल देखता रहता है ।
3.1.1: Two birds that are ever associated and have similar names, cling to the same tree. Of these, the one eats the fruit of divergent tastes, and the other looks on without eating.

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश । प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन्विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ ९॥

3.1.9: वह सूक्ष्म आत्मा, जिस (शरीर)-में पाँच प्रकारसे प्राण प्रविष्ट है उस शरीरके भीतर ही विशुद्ध विज्ञानद्वारा जाननेयोग्य है। उससे इन्द्रियोंद्वारा प्रजावर्गके सम्पूर्ण चित्त व्याप्त हैं, जिसके शुद्ध हो जानेपर यह आत्मस्वरूपसे प्रकाशित होने लगता है ।
3.1.9: Within (the heart in) the body, where the; vital force has entered in five forms, is this subtle Self to be realised through that intelligence by which is pervaded the entire mind as well as the motor and sensory organs of all creatures. And It is to be known in the mind, which having become purified, this Self reveals Itself distinctly.

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ ३॥ नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् । एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वां- स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४॥

3.2.3-4: यह आत्मा न तो प्रवचन (पुष्कल शास्त्राध्ययन) -से प्राप्त होनेयोग्य है और न मेधा (धारणाशक्ति) तथा अधिक श्रवण करनेसे ही मिलनेवाला है। यह (विद्वान्‌) जिस परमात्माको प्राप्तिकी इच्छा करता है उस (इच्छा)-के द्वारा ही इसको प्राप्ति हो सकती है। उसके प्रति यह आत्मा अपने स्वरूपको व्यक्त कर देता है । यह आत्मा बलहीन पुरुषको प्राप्त नहीं हो सकता और न प्रमाद अथवा लिंग (संन्यास)-रहित तपस्यासे ही (मिल सकता है) । परन्तु जो विद्वान्‌ इन उपायोंसे (उसे प्राप्त करनेके लिये) प्रयत्न करता है उसका यह आत्मा ब्रह्मधाममें प्रविष्ट हो जाता हे ।
3.2.3-4: This Self is not attained through study, nor through the intellect', nor through much hearing. By the very fact that lie (i.e, the aspirant) seeks for It, does It become attainable; of him this Self reveals Its own nature. This Self is not attained by one devoid of strength, nor through delusion, nor through knowledge unassociated with monasticism. But the Self of that knower, who strives thorough these means, enters into the abode that is Brahman.

स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति । तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ ९॥

3.2.9: जो कोई उस परब्रह्मको जान लेता है वह ब्रह्म ही हो जाता है। उसके कुलमें कोई अब्रह्मवित्‌ नहीं होता । वह शोक को तर जाता है, पापको पार कर लेता है और हृदयग्रन्थियोंसे विमुक्त होकर अमरत्व प्राप्त कर लेता है ।
3.2.9: Anyone who knows that supreme Brahman become Brahman indeed. In his line is not born anyone who does not know Brahman. He over comes grief, and rises above aberrations; and becoming freed from the knots of the heart, he attains immortality.

6. Mandukya Upanishad (Associated with Atharva Veda):

नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणं अचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमंशान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७॥

7: (विवेकीजन) तुरीयको ऐसा मानते हैं कि वह न अन्तःप्रज्ञ है, न बहिष्प्रज्ञ है, न उभयतः (अन्तर्बहिः) -प्रज्ञ है, न प्रज्ञानघन है, न प्रज्ञ है और न अप्रज्ञ है। बल्कि अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, एकात्मप्रत्ययसार, प्रपञ्चका उपशम, शान्त, शिव और अद्वैतरूप है। वही आत्मा है और वही साक्षात्‌ जानने योग्य है
7: They consider the Fourth to be that which is not conscious of the internal world, nor conscious of the external world, nor conscious of both the worlds, nor a mass of consciousness, nor simple consciousness, nor unconsciousness; which is unseen, beyond empirical dealings, beyond the grasp (of the organs of action), inferrable, unthinkable, indescribable; whose valid proof consists in the single belief in the Self; in which all phenomena cease; and which is unchanging, auspicious, and non-dual. That is the Self, and that is to be known.

7. Aitareya Upanishad (Associated with Rigveda):

स एतमेव सीमानं विदर्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विदृतिर्नामद्वास्तदेतन्नाऽन्दनम् । तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्ना अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२॥

1.3.12: बह इस सीमा (मूद्धों) को ही विदीर्ण​कर इसीके द्वारा प्रवेश कर गया । वह यह द्वार विदृति! नामवाला है; यह नानदन (आनन्द- प्रद) है । यह आवसथ (नेत्र), यद्द आवसथ (कण्ठ), यद्द आवसथ (हृदय) इस प्रकार इसके तीन आवसथ (वासस्थान) और तीन स्वप्न​ हैं।
1.3.12: Having split up this very end, He entered through this door. This entrance is known as vidrti (the cleft entrance). Hence it is delightful. Of Him there are three abodes — three (states of) dream. This one is an abode, this one is an abode, this one is an abode

यदेतद्धृदयं मनश्चैतत् । सञ्ज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिमतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः सङ्कल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति । सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥ २॥

3.1.2: यह जो हृदय है वही मन भी हे । संज्ञान (चेतनता), आज्ञान (प्रभुता), विज्ञान, प्रज्ञान, मेघा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, जूति (रोगादिजनित दुःख), स्मृति, सङ्कल्प, क्रतु, असु (प्राण), काम और वश (मनोज्ञ बस्तुओंके स्पर्शादिकी कामना)--ये सभी प्रज्ञानके नाम हैं ।
3.1.2: It is this heart (intellect) and this mind that were stated earlier. It is sentience, ruler ship, secular knowledge, presence of mind, retentiveness, sense-perception, fortitude* thinking, genius, mental suffering, memory' ascertainment, resolution, life-activities, hankering, passion, and such others. All these verily are the names of Consciousness.

8. Taittiriya Upanishad (Associated with Taittiriya Shaka of Krishna Yajurveda):

यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य ।

2.4.1: जहाँसे मनके सहित वाणी उसे न पाकर लौट आती है उस ब्रह्मानन्दको जानेवाला पुरुष कभी भयको प्राप्त नहीं होता । यह जो (मनोमय शरीर) है वही उस अपने पूर्ववर्ती (प्राणमय कोश)-का शारीरिक आत्मा है... ।
2.4.1: One is not subjected to fear at any time if one knows the Bliss that is Brahman, failing to reach which (Brahman, as conditioned by the mind), words, along with the mind- turn back

असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद । सन्तमेनं ततो विदुरिति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य ।

2.6.1: यदि पुरुष 'ब्रह्म असत्‌ है' ऐसा जानता है तो वह स्वयं भी असत्‌ ही हो जाता है और यदि ऐसा जानता है कि “ब्रह्म है" तो (ब्रह्मवेत्ताजन) उसे सत्‌ समझते हैं। उस पूर्वकथित (विज्ञानमय)-का यह जो (आनन्दमय) है शरीर- स्थित आत्मा है ।
2.6.1: If anyone knows Brahman as non-existing, he himself becomes non-existent, if anyone knows that Brahman does exist, then they consider him as existing by virtue of theft (knowledge).

9. Shvetashvatara Upanishad (Associated with Taittiriya Shaka of Krishna Yajurveda):

कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या । संयोग एषां न त्वात्मभावा- दात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २॥ ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् । यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥ ३॥

1.2-3: काल, स्वभाव, निर्यात, यदृच्छा, भूत और पुरुष--ये कारण हैं (या नहीं) इसपर विचारना चाहिये। इसका संयोग भी (अपने शेषी) आत्माके अधीन होनेके कारण कारण नहीं हो सकता तथा जीवात्मा भी सुख-दुःखके हेतु (पुण्यापुण्य कर्मो)-के अधीन है। (इसलिये वह भी कारण नहीं हो सकता) । उन्होंने ध्यानयोगका अनुवर्तन कर अपने गुणोंसे आच्छादित परमात्माको शक्तिका साक्षात्कार किया; जो (परमात्मा) कि अकेले ही कालसे लेकर आत्मापर्यन्त समस्त कारणोंके अधिष्ठान हैं ।

एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित् । भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥ १२॥

1.12: अपने आत्मामें स्थित इस ब्रह्मको सर्वदा ही जानना चाहिये। इससे बढ़कर और कोई ज्ञातव्य पदार्थ नहीं है । भोक्ता (जीव), भोग्य (जगत्‌) और प्रेरक (ईश्वर)--यह तीन प्रकारसे कहा हुआ पूर्ण ब्रह्म ही है--एऐसा जानना चाहिये ।

स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासादेवं पश्येन्निगूढवत् ॥ १४॥

1.14: अपने देहको अरणि और प्रणवको उत्तरारणि करके ध्यानरूप मन्थनके अभ्याससे स्वप्रकाश परमात्माको छिपे हुए (अग्नि)-के समान देखे ।

त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा सन्निवेश्य । ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयानकानि ॥ ८॥

2.8: (सिर, ग्रीवा और वक्षःस्थल-इन) तीनोंको ऊँचे रखते हुए शरीरको सीधा रख मनके द्वारा इन्द्रियोंको हृदयमें सन्निविष्ट कर विद्वान्‌ ओंकाररूप नौकाके द्वारा सम्पूर्ण भयानक जलप्रवाहोंको पार कर जाता है ।

लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादः स्वरसौष्ठवं च । गन्धः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति ॥ १३॥

2.13: शरीरका हलकापन, नीरोगता, विषयासक्तिकी निवृत्ति, शारीरिक कान्तिको उज्चलता, स्वरकी मधुरता, सुगन्ध और मल-मूत्रकी न्यूनता-इन सबको योगको पहली सिद्धि कहते हैं ।

वेदाहमेतं पुरुषं महान्त- मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ ८॥

3.8: में इस अज्ञानातीत प्रकाशस्वरूप महान्‌ पुरुषको जानता हूँ। उसे ही जानकर पुरुष मृत्युको पार करता है, इसके सिवा परमपदप्राप्तिका कोई और मार्ग नहीं है

अणोरणीयान् महतो महीया- नात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ॥ २०॥

3.20: यह अणुसे भी अणु और महानसे भी महान्‌ आत्मा इस जीवके अन्तः- करणमें स्थित है ।उस विषयभोगसंकल्पशून्य महिमामय आत्माको जो विधाताको कृपासे ईश्वररूपसे देखता है वह शोकरहित हो जाता है ।

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यन- श्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ६॥

4.6: सदा परस्पर मिलकर रहनेवाले दो सखा (समान नामवाले) सुपर्ण (सुन्दर गतिवाले पक्षी) एक ही वृक्षको आश्रित किये हुए हैं । उनमें एक उसके स्वादिष्ट फलोंको भोगता है और दूसरा उन्हें न भोगता हुआ देखता रहता है ।

ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ८॥

4.8: जिसमें समस्त देवगण अधिष्ठित हैं उस अक्षर परव्योममें ही वेदत्रय स्थित हैं (अर्थात्‌ वे भी उसीका प्रतिपादन करते हैं)। जो उसको नहीं जानता वह वेदोंसे ही क्या कर लेगा? जो उसे जानते हैं वे तो ये कृतार्थ हुए स्थित हैं ।

न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा हृदिस्थं मनसा य एन- मेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २०॥

4.20: इसका स्वरूप नेत्रादिसे ग्रहण करनेयोग्य स्थानमें नहीं है, उसे कोई भी नेत्रद्वारा नहीं देख सकता । जो इस हृदयस्थित परमात्माको शुद्धबुद्धि यानी मनसे इस प्रकार जान लेते हैं वे अमर हो जाते हैं ।

तद् वेदगुह्योपनिषत्सु गूढं तद् ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम् । ये पूर्वं देवा ऋषयश्च तद् विदु- स्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ॥ ६॥

5.6: वह वेदोंके गुह्यभाग उपनिषदोंमें निहित है, उस वेदवेद्य परमात्माको ब्रह्मा जानता है,जो पुरातन देव और ऋषिगण उसे जानते थे वे तद्रूप होकर अमर ही हो गये थे ।

बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ९॥ नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः । यद्यच्छरीरमादत्ते तेने तेने स युज्यते ॥ १०॥

5.9-10: सौ भागोंमें विभक्त किया हुआ जो केशके अग्रभागका सौवाँ भाग है उस जीवको उसके बराबर जानना चाहिये; किन्तु वही अनन्तरूप हो जाता है । यह (विज्ञानात्मा) न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है ।यह जो-जो शरीर धारण करता है उसी-उसीसे सुरक्षित रहता है ।

स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः । देवस्यैष महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥ १॥

6.1: कोई बुद्धिमान्‌ तो स्वभावको कारण बतलाते हैं और दूसरे कालको। किन्तु ये मोहग्रस्त हैं (अतः ठीक नहीं जानते) । यह भगवानूकी महिमा ही है, जिससे लोकमें यह ब्रह्मचक्र घूम रहा है ।

न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ ८॥ न तस्य कश्चित् पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् । स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥ ९॥ यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः स्वभावतः । देव एकः स्वमावृणोति स नो दधातु ब्रह्माप्ययम् ॥ १०॥

6.8-10: उसके शरीर और इन्द्रियाँ नहीं हैं, उसके समान और उससे बढ़कर भी कोई दिखायी नहीं देता,उसकी पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है और वह स्वाभाविकी ज्ञानक्रिया और बलक्रिया है । लोकमें उसका कोई स्वामी नहीं है, न कोई शासक या उसका चिह्न ही है। वह सबका कारण है और इन्द्रियाधिष्ठाता जीवका स्वामी है । उसका न कोई उत्पत्तिकर्ता है और न स्वामी है । तन्तुओंसे मकड़ीके समान जिस एकमात्र देवने स्वभावतः ही प्रधानजनित कार्योसे अपनेको आवृत कर लिया है वह हमें ब्रह्मसे एकीभाव प्रदान करे ।

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १४॥

वहाँ सूर्य प्रकाशित नहीं होता, न चन्द्र और तारे प्रकाशित होते हैं और न ये बिजलियाँ ही चमकती हैं, फिर यह अग्नि तो कहाँ प्रकाशित हो सकता है? ये सब उसके प्रकाशित होनेसे ही प्रकाशित होते हैं, उसीके प्रकाशसे ये सब प्रकाशित हैं ।